कोरिया जिले के खड़गवां स्थित ग्राम लकड़ापारा में आदिवासी समुदाय द्वारा प्राचीन गोटुल व्यवस्था को लेकर किया पारम्परिक ग्रामसभा का आयोजन

(ज्वालासिंह आयाम संवाददाता की ओर से)

कोरिया छत्तीसगढ GCG NEWS पांचवी अनुसूचित जिला कोरिया में गोंड आदिवासी बाहुल्य इलाका देवाडांड के मुख्यमार्ग लकरापारा में पारम्परिक ग्रामसभा का आयोजन किया गया। जहां गोंड जनजाति समुदाय की मूल व्यवस्था के अनुकूल गोटूल परम्परा की स्थापना के लिए प्रस्ताव लाया गया। जिसमें सर्व सम्मति से पास किया गया है। उक्त दौरान हसदेव नदी की तराई की भुलेरी पाठ जो फिलहाल वनभूमि के भीतर निस्तार में है। जो गैर वर्गो की अवैध कब्जा की निशाने पर है।जहां 4 साल पहले बृक्षारोपण भी हुआ था। लेकिन वन विभाग की उदासीनता और गैर वर्गो की अवैध कटाई से आज सैकड़ो एकड़ भूमि में कोई पौधा नजर नहीं आता। बंजर हो गया है। इस प्रकार से आज क्षेत्रों में जहां बढ़ते आबादी का दबाव जंगलों पर है। जिस पर सर्वाधिक हमला जो सरगुजा से गैर आदिवासी वर्ग के लोग मंहगे में जमीन बेच करआये हैं। जो मरे गिद्ध की भांति मुप्त में जंगल भूमि पर हमला कर रहे हैं। वहीं वन अंमलो की मिली भगत से आज जंगल के रिजर्व भूमि जैसे कटकोना के सुंदरपुर रिजर्व वनभूमि जहां बड़े बड़े पक्के का मकान बन गए हैं। वन विभाग के अमले सिर्फ ठूठ गिनते नजर आते हैं। दुखद पहलू यह है कि जंगल भूमि सीमा मुदारा भी गायब होते जा रहा है। यहां तक कि गरीब आदिवासियों को मिले वन अधिकार पट्टे के भूमि में भी ये बाहरी लोग   दादागिरी के साथ मकान बना लिये हैं। जिससे भोले भाले आदिवासी जनता हाथ मलते फिर रहे हैं। कार्यवाही के लिए जब आगे आते हैं,तो गैर वर्ग के इन सता के दबंगो के सामने वनकर्मी भी सहम जाते हैं। आज बड़ी और गंभीर
सवाल यह है। कि उजड़ते जंगलो को बचाए तो बचाए कौन? ऐसे हल्को में विभाग के आला अफसरों की कड़ाई भी कमोवेश संदिग्धता से कम नहीं। वहीं छोटे वनकर्मी करें, तो करें क्या? कुछ गैर वर्ग के ऐसे भी वनकर्मी पदस्थ हैं जो वनों को अपने पुस्तैनी अधिकार मानते हैं। और चंद नोट की टुकड़ों के लिए धड़ल्ले से रिजर्व फारेस्ट भूमि को गैर वर्गों को बिना किसी नियम कानून के नक्शा काट कर दे दिया जाता है।और सरे आम कब्जा करवाया जाता है। इस प्रकार की यह मामला खड़गवां रेंज की बेलबेहरा वन परिसर की है। जिस बात की लिखित शिकायत वन मंडल से लेकर वनमंत्री कार्यालय तक पहुंचा दिया गया, लिहाजा वन आधिकारियों द्वारा अपने दायित्व को अब तक नहीं निभा सके। न कोई कार्यवाही कर सके। जिससे जंगलो पर हमला मनमानी हो गया है। ऐसे गतिविधियों को रोकने के लिए अब आदिवासी समाज सामने आयेगी। जैसा कि जल जंगल और जमीन से पहचान बने आदिवासी समाज की अस्तिव आज खतरे में दिख रहा है। जिनके हाथो से आज नौकरी तो चला गया,और जमीन भी इन आदिवासियों के हाथो से जा रहा है। इन्हीं मुद्दों को लेकर आज आदिवासी समाज वरिष्ट सामाजिक कार्यकर्ता डॉ एल एस उदय ने इस पारम्परिक ग्राम सभा में भाग लिया और कहा कि आज जंगल बंजर हो चुके हैं, जंगलों को बचाना  समाज का भी दायित्व है। इसीलिए हमें भी पौधरोपण जैसे कार्य करना चाहिए। वहीं गांव के लोगों को जंगल का महत्व भी समझाना चाहिये। कि आज जंगल है,तो हम हैं, और कल भी रहेंगे।अब हम सरकार के भरोसे नहीं रहेंगे। क्यों कि यह पांचवी अनुसूचित क्षेत्र है। जहां पर बिना ग्राम सभा के गौठान तक नहीं बन सकता। लेकिन हमारे लोगों को संवैधानिक जानकारी के अभाव में क्षेत्र में आज आताताइयों का राज होते जा रहा है। जंगल देखते देखते उजड़ रहे हैं। जो मानव जीवन के अस्तित्व के लिए खतरे से कम नहीं है।