
(विशेष संवाददाता द्वारा)
गौरेला पेंड्रा मरवाही, छत्तीसगढ़/GCG NEWS 29 मई 2022
सूत्रों के मुताबिक जिले के अंतर्गत बहू प्रसिद्ध मां दुर्पता चौरा स्थल में मूर्ति स्थापना के विरोध में उतरा पारंपरिक आदिवासी महासभा की आवाज मुखर हो गया है। जैसा कि मूर्ति स्थापना के लिए एसडीएम मरवाही ने ट्रस्ट का एक बुलवाया था बैठक बुलवाया था,भनक लगते ही आदिवासी भड़क उठे हैं।
आज पांचवी अनुसूची क्षेत्रों में महती जरुरत आज आदिवासी रूढ़िजन्य पंरमपरा है।जिसे इन क्षेत्रों में संविधान में अनुच्छेद 244 (1) के तहत 13(3) के विधि का बल निहित है। वहीं इन हल्कों में बिना ग्राम सभा के प्रस्ताव के बिना इस प्रकार का कृत्य संभव नहीं है। भारत सरकार अधिनियम 1935 के मुताबिक यह रक्षित है। तथा यहाँ मंत्री मंडल का विशिष्ट कानून लागू नहीं होता,जहां अनुसूचित जनजाति सलाहकार परिषद सर्वोच्च होता है।
यह तो पानी में तेल की तरह साफ है कि अलबत्ता यहां के शान्ति प्रिय क्षेत्र में आदिवासियों की पंरमपरा के विपरीत मुर्ति स्थापना किया जा रहा है। दरअसल संवेदनशील मुद्दा जानबूझकर बनाया जा रहा है। इतना तो तय है कि स्थानीय आदिवासी समाज को अब जनआंदोलन से रोक पानाा संंभव नहीं है।
जैसा कि बीते बैठक में बिन बुलाए पहुंचे पांच सौ आदिवासी सदस्य शामिल हो गए थे।
गोंडवाना छत्तीसगढ़ न्यूज को गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं आदिवासी श्री जयनाथसिंह केराम ने एक विज्ञप्ति में कहा है कि यह अनुसूचित क्षेत्र और भारतीय संविधान के अनुच्छेद२४४(१) में आता है।जहां अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासियों का स्वशासन, अनुच्छेद १३(३)क, आदिवासियों के परंपरा और रूढ़ि को विधि का बल प्राप्त है,और पेशा एक्ट १९९६ में ग्राम सभा प्रस्ताव के बिना कोई निर्माण विधिविरुद्ध है ।
वहीं हाल ही में मरवाही जिला जीपीएम के ग्राम पंचायत धनपुर स्थित आदिशक्ति मां दुर्पता माई मंदिर प्रांगण में मां दुर्गा देवी की मूर्ति स्थापना के विरोध में पारंपरिक आदिवासी महासभा ने एसडीएम मरवाही को ज्ञापन सौंप कर मूर्ति स्थापना पर रोक लगाने का मांग किया है।
गौरतलब है कि विगत कुछ माह से धनपुर के माता दुर्पता आस्था स्थल को लेकर हिन्दू धर्मावलंबी और आदिवासी समाज आमने-सामने खड़ा है। जहां स्थानीय आदिवासियों का आरोप है, कि उक्त आस्था स्थल में आदिकाल से आदिवासियों के धार्मिक आस्था का केन्द्र रहा है और माता दुर्पता चौरा के नाम से विख्यात रहा है। माता दुर्पता चौरा स्थल में सदियों से आदिवासी बैगाओं के द्वारा पारंपरिक और रूढ़िगत तरीकों से पूजा अर्चना किया जाता रहा है। और बैगा ही मुख्य पुजारी होते हैं ।
लगभग १५-२० साल पहले कुछ बाहरी लोगों के द्वारा आदिवासियों के सांस्कृतिक और धार्मिक रूढ़ियों को खत्म करने और उक्त आस्था स्थल पर कब्जा करने के नियत से हिन्दू देवी देवताओं की पूजा प्रारंभ किया गया है। विचारणीय प्रश्न यह है कि इतने लंबे अरसे के बाद इस तरह का विरोध समझ से परे है। वर्तमान में विरोध के संबंध में पूछे जाने पर पारंपरिक आदिवासी महासभा के कार्यवाहक अध्यक्ष हेमचंद मसराम ने कहा कि जब आदिवासी समाज को अपने साथ हो रहे धार्मिक अतिक्रमण का पता चला तो हम संवैधानिक स्तर पर अपने आस्था स्थलों पर संरक्षण चाहते हैं। हेमचंद मसराम ने यह भी कहा कि शासन प्रशासन आदिवासियों के सांस्कृतिक और पारंपरिक विरासत तथा धरोहरों को खत्म करना चाहती है । जब कि आदिवासियों की पहचान ही उनकी सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराएं रही हैं। पारंपरिक आदिवासी महासभा के सचिव सुश्री सीमा सिंह पोर्ते ने बताया कि सरगुजा संभाग के जिला बलरामपुर में स्थित बाबा बच्छराज कुंवर धाम के मामले में न्यायालय श्रीमान अनुविभागीय दंडाधिकारी बलरामपुर ने अनुसूचित क्षेत्रों में पब्लिक ट्रस्ट को विधि विरुद्ध माना है। और माननीय उच्च न्यायालय छत्तीसगढ़ ने उक्त निर्णय की पुष्टि किया है ,ऐसे में जिला प्रशासन जीपीएम को माननीय उच्च न्यायालय के निर्णय अनुरूप धनपुर पब्लिक ट्रस्ट को विधिविरुद्ध मानना चाहिए था।
वहीं इस मामले को लेकर छत्तीसगढ़ के अन्य आदिवासी संगठन भी लामबंद होने लगे हैं।
इस मामले में उन्होनें अपने आप इशारा करते हुए कहा है कि गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता जयनाथ सिंह केराम के ऊपर भी उंगली उठ रही हैं ,पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी जी के मृत्यु उपरांत मरवाही उप चुनाव में बतौर गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के चुनाव प्रभारी मरवाही के भूमिका में रहे हैं । गोंगपा नेता श्री केराम ने कहा कि इससे पहले सरगुजा संभाग में कुदरगढ़, मां महामाया मंदिर देवीपुर,बाबा बच्छराज कुंवर धाम बलरामपुर, रामगढ़ धाम में पब्लिक ट्रस्ट के विधि विरुद्ध होने को लेकर समाज को लामबंद करते रहें हैं।