रायपुर में आयोजित राष्ट्रीय जनजातीय साहित्य महोत्सव का त्रिदिवसीय कार्यशाला हुआ संपन्न, देश भर के शिक्षाविद प्रोफेसरों सहित साहित्यकारो ने लिया हिस्सा।

  “संपादक,गोंडवाना उदय की ओर से डॉ एल एस उदय द्वारा”

रायपुर छत्तीसगढ़ (मध्य गोंडवाना प्रक्षेत्र) रायपुर छत्तीसगढ़, GCG NEWS, 22 अप्रैल 2022 भौगोलिक भू- गार्भिक तौर पर गोंडवाना पेंच स्थित मध्य भूभाग में बसे बहुसंख्यक आदिवासी जन जाति बाहुल्य प्रदेश छत्तीस गढ़ राज्य को माना जाता है। जहां पर इन वर्गों के हितों की संरक्षण एवं संवर्धन के लिए भारतीय संविधान के द्वारा यह हल्का पांचवी अनुसूचित क्षेत्र की अनुच्छेद 244 के तहत जनजाति कल्याण व विकास के लिए  स्वायत्त व संरक्षित है। अमूमन इन्हीं उदेश्यों को लेकर भारत सरकार के जनजाति कार्य मंत्रालय नई दिल्ली के कार्य योजना के अनुमोदन के पश्चात आदिम जाति कल्याण तथा अनुसूचित जाति विकास इंद्रावती भवन रायपुर की ओर से छत्तीसगढ़ राज्य मुख्यालय रायपुर स्थित पं दीनदयाल उपाध्याय आडिटोरिम हाल में 19 से 21अप्रैल 2022 तक त्रि-दिवसीय राष्ट्रीय जन जातीय साहित्य महोत्सव कार्यक्रम का आयोजन किया गया। जिस कार्यक्रम में देश भर के शिक्षाविद, प्रोफेसरों सहित साहित्यकारों ने हिस्सा लिया। इस दौरान मानें जाने आदिवासी समुदाय के शिक्षा विदों ने जन जातियों के विकास से लेकर उनके मुद्दे और चुनौतियों को कार्यशाला के दौरान बात को सदन में रखा। जो मूलरुप से जनजाति विकास के साथ ही साथ जन जातियों की आबादी की अधि कार हीनता की परि स्थितियों को सुधारने पर जोर दिया। तथा उनके जीवन में गुणात्मक उन्नति के साथ ही साथ संवैधानिक संरक्षण और सुरक्षा प्रदान करने संबंधी विषयों से लेकर जनजाति वर्गों की सामाजिक निर्योग्य ताएं को हटाना एक प्रमुख विषय रहा है। इस कार्यक्रम में मुख्य रूप से आदिवासी समुदाय के बारे में जाने मानें शिक्षाविद,डॉ के एम मैत्री जो वर्तमान में तेलांगना राज्य में प्रोफेसर हैं । जिन्होनें आडि टोरियम के संकल्प हाल में अपने शोध कार्यशाला के आसन्दी से कहा- कि मेरा विषय है, कि भारत में विस्ता रित गोंड जनजाति और गोंडी भाषा की मानकी करण। जैसा कि भारत में सबसे ज्यादा हम गोंड समाज को पाते हैं। जिन गोंंड जन जातियों का 15 राज्यों में इनका पहचान बन चुकी है। जिनकी संख्या भी ज्यादा है, तथा अलग अलग जगहों पर जिनके द्वारा गोंडी भाषा को अलग अलग तरीके से बोली जाती है। यहां के बहु संख्यक, लोग  द्रविण भाषा जैसे   कर्नाटक, तेलगु, आंध्रा, केरला, तमिल, जहां गोंडी की लेंग्वेज ज्यादा है। सभी भाषा की “कोया” को एक मूल भाषा माना जाता है। लेकिन यह भाषा बढ़ते बढ़ते जिसे अलग अलग नाम मिल गया। जैसा कि तेलांगना कुछ गोंडी भाषा है। जैसा कि राज्यों की आबादी के कारण भाषा की उदगम हो गई। जैसे बस्तर एवं आदिलाबाद शहर को छोड़  हिंदी को नकारा गया है। सरकार द्वारा 2004 के बाद से भाषा मानिकी करण को लेकर कोई पहल नहीं हो पाया है। वहीं गोंडी भाषा को संविधान की 8 वीं अनुसूची में शामिल करने की कोशिस जारी है। जिसे पहले हो जाना चाहिए था। जब कि यह समुदाय के लोग दक्षिण से उतर की ओर आ गए। जिसका चित्रण की रायलनुमा गोंडवाना है। देखा जाए तो आज जितना भी प्राचीन स्मारक एवं टेंपल है, गोंडवाना की प्रतीक चिन्ह एक कनेक्टि विटी है। आज समाज के किताबों में गोंडी भाषा की डिक्शनरी बनाने की जरुरत है। उन्होंनेे कहा कि हैदराबाद अंचल में गोंडी एक भाषा के रूप में कुछ जगहों में प्रचलित है, आज गोंडी की चार लिपि सामने आयी है। जो गोंडी भाषा मानकी करण में दिक्कत हो रही है। जैसा कि मोतीरावेन कंगाली जो सैन्धव लिपी की खोज किया। वास्तव में कर्नाटक एक रायलनुमा गोंडवाना से मिलती जुलती है । उसी प्रकार बस्तर के चित्र गुफा सहित मोहन जोदडो हड़प्पा के समय का भीति चित्र प्रमुख है। आयोजित इस त्रि दिवसीय कार्यक्रम में प्रमुख रूप से डॉ बिपिन जोजो, शरद जेना, डॉ संदेशा रैयपा गाब्रियाल, डॉ स्नेहलता नेगी, डॉ गंगा सहाय मीना, डॉ हरिराम मीना, डॉ अल्का सिंह, डॉ रविन्द्र प्रतापसिंह, प्रो पी सुब्बाराव, पदम श्री दमयंती बेसरा, डॉ सत्य रंजन महकुल, प्रो टी व्ही कट्टीमनी, डॉ अभिजीत पायेंग, डॉ कंचन शर्मा, श्री आजोयेंद्र नाथ त्रिवेदी, डॉ देवमत मिंज,पदम श्री हलधर नाग, श्री मति वन्दना टेटे, श्री अश्वनी कुमार पंकज, श्री महादेव टोप्पो, डॉ रेखा नागर, श्री मदन मास्कले, डॉ के एम मैत्री, श्री वाल्टर में, श्री एस के पांडेय, श्री मति जोरबा मुर्मू, श्री वर्जनेस खाखा, ए के मिश्रा, पदम श्री साकीनेती चंद्रायह, तेलंगाना सहित कई शिक्षाविदों ने अपने अपने शोध विषयों के आधार पर वक्तव्य दिया। आयोजित इस त्रिदिवसीय कार्यक्रम जो जनजाति वर्गों के लिए एक वेहद प्रेरणाप्रद व ऐतिहासिक कार्यक्रम रहा है। इस अवसर पर कुछ शोध वाचको ने जनजाति अत्याचार से लेकर विस्थापन तथा वैश्वीकरण जैसे मुददों पर प्रकाश डालते हुए कहा, देश में प्रगति के लिए  सरकार को विकास की ओर ले जाना चाहिए। पर मूलरुप से बसे यहां के आदिम जनजाति वर्गों के उनकी भाषा परंपरा तथा संस्कृति को किसी प्रकार उजाड़ा नहीं जाना चाहिए। तथा सरकार द्वारा इन वर्गों को मिले उनके अधिकारो से वंचित नहीं करना चाहिए। इस कार्यक्रम में प्रदेश के आदिम जाति व शिक्षा मंत्री डॉ प्रेमसाय सिंह टेकाम सहित प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने इस कार्यक्रम में  हिस्सा लिया, और संबोधित किया।