पांचवीअनुसूचित क्षेत्र में कोर्ट ने बच्छ राजकुँवर धाम को लेकर आदिवासियों के पक्ष में दिया ऐतिहासिक निर्णय । अब ट्रष्ट पर गैरआदिवासियों का दखल हटा। कोर्ट के निर्णय पर आदिवासी समुदाय का सम्मान बढ़ा।
पांचवीअनुसूचित क्षेत्र में कोर्ट ने बच्छ राजकुँवर धाम को लेकर आदिवासियों के पक्ष में दिया ऐतिहासिक निर्णय । अब ट्रष्ट पर गैरआदिवासियों का दखल हटा। कोर्ट के निर्णय पर आदिवासी समुदाय का सम्मान बढ़ा।
सूरजपुर जिले के मानपुर स्थित प्रसिध्द आदिवासियों का ऐतिहासिक धाम बाबा बछराज कुंवर को गैर आदिवासियो द्वारा ट्रस्ट के माध्यम से नियंत्रण कर लिया था। जिसके के विरुद्ध स्थानीय आदिवासी समुदाय ने आपत्ति दर्ज करते हुए उच्च न्यायालय बिलासपुर में एक याचिका दायर की थी। इसी दौरान माननीय कोर्ट आपति स्वीकार लिया। तथा कोर्ट ने इस मामले को लेकर जवाब मांगा था। इसी बीच अनुविभागीय आधिकारी सह रजिष्ट्रार लोकन्यास जिला बलरामपुर द्वारा गैर आदिवासी वर्ग की ओर से ट्रष्ट निर्मांण हेतु दिया गया आवेदन याचिका को खारिज करने का आदेश दिया है।
गौरतलब छत्तीसगढ़ राज्य की उत्तरप्रदेश से सटा हुआ सरहदी इलाका जो आदिवासी सुदुर वन-अंचल है।जहां पर जिला बलरामपुर मुख्यालय के समीपवर्ती ग्राम मानपुर मे आदिवासियो द्वारा पुज्यनीय पवित्र स्थल बाबा बछराज कुंवर धाम स्थित है। सच मानें तो सरगुजा संभाग के स्थानीय निवासियो का बाबा बछराज कुंवर धाम के प्रति विशेष श्रद्धा व आस्था निहित है। यह धाम कई सदियो पुराना है ,तथा इस धाम की मान्यता के बारे में प्रसिद्ध अंग्रेज इतिहासकार सर क्रूक ने अपनी 1896 मे प्रकाशित किताब “कास्ट एंड ट्राईब आफ नार्थ वेस्ट प्रोविंस एंड ओउध ” मे विस्तृत वर्णण किया है। आदिकाल से ही इस धाम का नियंत्रण एवम व्यवस्थापन व पूजा अर्चना स्थानीय आदिवासियो द्वारा अपनी रुढ़ी प्रथा के द्वारा ही किया जा रहा था। धाम मे आदिवासियो द्वारा अपनी परम्परागत विधी अनुसार पूजा की जाती है, तथा अपनी रुढ़ी मान्यताओं के अनुसार देवता को पूजते हैं। पूजा कार्य स्थानीय बैगा द्वारा किया जाता है, तथा धाम मे बली प्रथा भी प्रचलित है। जो संविधान के पांचवी अनुसूची द्वारा संरक्षित इस क्षेत्र मे कतिपय गैर आदिवासियो द्वारा ट्रस्ट के माध्यम से नियत्रण करने का प्रयास किया जा रहा था। .सरगुजा संभाग के लगभग 30 ग्राम पंचायत एवम नौ स्थानीय संगठन एवम पारम्परिक आदिवासी महासभा द्वारा इस संबंध मे अनुविभागीय अधिकारी के समक्ष लिखित एवम मौखिक आपत्ती दर्ज करायी गयी थी। ट्रस्ट गठन के विरुद्ध आपति पर सुनवाई अनुविभागीय आधिकारी सह रजिष्ट्रार लोकन्यास जिला बलरामपुर द्वारा की गयी। आपति मे बताया गया कि, गैर आदिवासियो द्वारा आदिवासियो की रूढ़ी प्रथा से संचालित पूजा स्थल का नियंत्रण से आदिवासियो की मूल संस्कृति नष्ट हो जायेगी। जबकि इस क्षेत्रों में संविधान की अनुच्चेद 244 एवम पांचवी अनुसूची के तहत आदिवासियो को विशेष संरक्षण प्राप्त है। रूढ़ी प्रथा को वैधानिक मान्यता प्राप्त है, तथा इस क्षेत्र मे पेसा कानून (Panchayat extension to schedule areas act 1996) लागू होने से स्थानीय ग्राम सभा की सहमती भी आवश्यक है। ट्रस्ट निर्मांण के विरुद्ध पूर्व में पारम्परिक आदिवासी महासभा द्वारा अधिवक्ता सुशोभित सिंह ,सुखनाथ पैकरा के माध्यम से उच्च न्यायालय मे जनहित याचिका भी प्रस्तुत की गयी थी। ज़िसमे उच्च न्यायालय द्वारा नोटिस जारी किया गया था। जिससे अनुविभागीय आधिकारी सह रजिष्ट्रार लोक न्यास जिला बलरामपुर द्वारा प्रकरण का सुक्ष्म परिक्षण कर सभी पक्षकारो को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात और गैर आदिवासियो द्वारा प्रस्तुत ट्रस्ट निर्मांण हेतु आवेदन को खारिज कर दिया गया है। इस निर्णय से प्रदेश के आदिवासी समुदाय द्वारा काफी प्रशन्नता व्यक्त किया है। वहीं इसे एक ऐतिहासिक फैसला मानते हुए कोर्ट के प्रति आस्था और सम्मान जताया है। जिससे आदिवासियों मूल संस्कृति व परम्परा को बचाया जा सकता है।