रायपुर छत्तीसगढ़ 6 जून GCG NEWS/ आज देश के भीतर 10 ऐसे राज्य हैं, जो गवर्नमेंट आफ इंडिया के भारत सरकार अधिनियम 1935 act कानून के मुताबिक संघ प्रशासन दो हिस्सों में था पहला हस्तांतरित दूसरा रिजर्व रक्षित जो अनुसूचित जनजाति क्षेत्र के आलावा रक्षित विषयों के प्रतिरक्षा,विदेशविदेशी,धार्मिक विषय शामिल थे। बाकी सभी हस्तांतरित ग्रूप में आते थे। जिस समय विधान सभा और राज्य परिषद होता था। विधान सभा में 375 सदस्य,जिसमें भारतीय ब्रिटिश 250,और भारतीय रियासत के 215 सदस्य होते थे।
तकलीफ देह सवाल यह है कि रिजर्व आरक्षित क्षेत्रों में जनजातियों के हितों के लिए लागू कानून किस खांचे में रख सरकार देख रही है।जिन पर इनके भविष्य का फैसला निहित है। आज भारतीय संविधान जो 26 जनवरी 1946 से प्रभावी है जिसमें भाग 10 जिसमें अनुसूचित और जन जाति क्षेत्र 244(1) में इन वर्गो की प्रशासन और नियंत्रण से संबंधित अधि नियम उपबंध के आखिर आरक्षित क्षेत्रों में प्रभावी ढंग से लागू क्यों नहीं है। जबकि आज पाँचवी अनुसुची का आधार पारंपारिक रूढीगत ग्राम सभा है, न कि ग्राम पंचायत सर्वोपरी है।
गौरतलब सच तो यह है कि हमारे पारंगत रूढ़ि के मुताबिक हमारे गाँव पटेल ( मुख्या)गाँव डालाह(अनुभवी) गाँव पुजारा(Culture)
गाँववर्ती(Speach and manegment) गाँंव कोटवार (Information) यह हमारी रूढ़िजन्य व्यवस्था सर्वोच्च था । आज पुरखो की ये न्यायिक व्यवस्था का निर्माण करना होगा। उल्टे आज हम पंच और सरपंच बना बैठे, लिहाजा आज फिर गाँव में गाँव पटेल न्याय करेगा या गाँव का सरपंच। गाँव की सरपंच और गाँव का सचिव ये दोनो शासन और प्रशासन के अधीन काम करने वाले लोग होते हैं। जो कि स्थायी नही होते। सरपंच पाँच साल के लिए होता है, और सचिव उसके बदली होने तक, लेकिन हमारे गाँव का पटेल जबसे गाँव का निर्माण हुआ है, तब से गाँव में है। और 1950 के संविधान के एक हजार साल पहले से आदिवासी समाज का न्याय करता आ रहा है। और इस पारंपारिक रूढ़ीगत ग्रामसभा को संविधान की अनुच्छेद 13(3)(क) में विधी का बल प्राप्त है। मतलब भारत का संविधान में विधि को बनाने वाली अनुच्छेद 366 भी इसको मान्यता देती है।
अगर आपका गाँव जो भारत शासन द्वारा जारी किये गये राजपत्र जिस पर भारत देश के राष्ट्रपति के हस्ताक्षर है। जो इन वर्गो के लिए सर्वोच्च कानून है। और आपके गाँव में पारंपारिक रूढीगत ग्रामसभा सर्वोच्च है। जिससे अनुच्छेद 19 (5)(6) के मौलिक अधिकारो का उपयोग करके अपनी संस्कृति,अपनी जनसंख्या,अपनी जमीन,अपने जंगल,अपने खनिज की रक्षा कर सकते हैं । और अगर आप पंच, सरपंच, जनपद, जिला पंचायत,विधायक,संसद बनाने को सोच रहे हैं। तो बहरहाल पाँचवी अनुसूची का सपना देखना फिलहाल न्योचित नहीं लगता।क्योंकि न लोकसभा न राज्यसभा
सबसे ऊची ग्राम सभा।मतलब राष्ट्रपति, संसद, विधायक और इनके द्वारा बनाए गए गये सभी कानून भी रूढीगत ग्रामसभा के सामने बोने है। छोटे है। क्योंकि देश की सर्वोच न्यायालय सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला है। कि कोई राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री संविधान से बडा नही होता।अगर अपके गाँव में पारंपारिक रूढीगत ग्रामसभा है। तो अनुच्छेद 275 के फंड से अपने गाँव के विकास कार्य करा सकते हैं ।और ये फंड केन्द्र से आदिवासियो के लिए जारी किया जाता है। लेकिन ग्राम सभाओ के अभाव में कोई क्लेम नही होता।और ये फंड का दूसरे मद में इसका उपयोग हो जाता है। क्योंकि सरपंच इसके लिए क्लेम नही कर सकता। वो किसी राजनीतिक पार्टी का सदस्य होता है,गाँव की पारंपारिक रूढीगत ग्रामसभा का नही, इसलिए हर गाँव में सरपंच की जगह अपने गाँव पटेल नियुक्त करो।