कोरबा छत्तीसगढ़ (GCG NEWS) 9 मार्च 2021 आज प्रदेश मे सतारुढ सरकार के कोख में पल रहे खनिज मफियाओ, जिनका गिद्धदृष्टि आज भोले भाले आदिवासी समुदाय के जीवन का आधार जल जंगल और जमीन की बेशकीमती संपदाओं पर है। जहां हक्क की आवाज उठाने पर न्याय न मिलना एक फितरत बन गया है।
उक्त बातें गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव डॉ एल एस उदय ने मिडिया के माध्यम दी है। और कहा है कि प्रदेश की पांचवी अनुसूची की अनुच्छेद 244 (1) से जुड़ी हुई, अनुसूचित जनजाति बाहुल्य कोरबा जिले का वह इलाका दुल्लापुर, बगबुड़ी, झिंनपुरी, कोरबी जैसे दर्जनों गांव के आदिवासी किसानों जिनका जीवनदायनी हसदो नदी है। बहरहाल इन दिनों रेत मफियाओ द्वारा अवैध उत्खनन की जानकारी मिलने पर गहरी आक्रोश जताया है। और कहा है कि यह इलाके में वगैर ग्रामसभा के स्वीकृति के बिना एक पत्ते तक नहीं हिल सकता है। पर यहां पर मफियाओं का राज कैसे ? उन्होंने अपने पार्टी के पदाधिकारियों का आपात बैठक बुलाकर कहा है कि,अवैध रेत उत्खनन को लेकर स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों से बात कर शीघ्र बंद करने की पहल की बात कही है । यदि लीज है, तो शर्तों का अनुपालन सुनिश्चित हो। यदि ऐसा नहीं हुआ तो जनहित में हमारी पार्टी जनांदोलन के लिए मुखर होगी। कुल मिलाकर उन्होने प्रदेश सतारुढ सरकार की नीति और नीयत पर सवाल खड़ा करते हुए कहा है कि आदिवासी क्षेत्रों में अधिकांश पढ़े लिखे नौजवान दर दर भटक रहे हैं। जिन्हें पलायन का शिकार होना पड़ रहा है। जिनके सामने आज रोजगार की संकट है। वहीं अब मुंगेरी लाल के हसीन सपने दिखाना बंद करे। आज आदिवासी क्षेत्रों से गैर लोगों को रेत उत्खनन का सरकार यदि लीज दे रही है। तो स्थानीय वेरोजगारो को लीज देने में इनके चूले क्यों हिल रही है। डॉ उदय ने कहा कि, आज आदिवासी पढ़े लिखे वेरोजगार जो हालातो से टकराते हुए,अमूमन पलायन के शिकार हो रहे हैं। आखिर जिम्मेदार कौन है? उल्टे मापने वाली सरकार यहां पर आदिम निवासी क्षेत्रों के अमूल्य संपदा के हुकूमत गैरों के हाथों सौपना यह सरकार दोहरी नीति है जिसे अब गोंडवाना गणतंत्र पार्टी चलने नहीं देगी। सूत्रों की मानें,तो पोड़ी उपरोड़ा के दुल्लापुर हसदेव नदी में रेत का अवैध रूप से उत्खनन लगातार जारी है। महज स्थानीय प्रशासन धृतराष्ट्र जैसे आंखो में पट्टी बांध कर आदिवासी समुदाय के सामने घड़ियाली आंसू बहा रही है। वहीं यहां के इन अनुसूचित जनजाति क्षेत्रों में जिसे लीज देना बताया जा रहा है। उसे ग्राम पंचायत के लोग जानते तक नहीं। जहां धडल्ले से पोकलेन, जेसीबी मशीन रेत उत्खनन लगातार हो रहा है। जिसे लगाम कसने में प्रशासन नाकाम है। सच तो यह है कि इन आदिवासी हल्को के सर्वाधिक रेत का उत्खनन पोड़ी उपरोड़ा के दुल्लापुर हसदेव नदी से उत्खनन करने की जानकारी है। स्थानीय सूत्रों की कहना तो यह भी है कि रेत माफ़िया रोजाना सैकड़ों की संख्या में हाईवा और ट्रैक्टर के जरिए नदी का सीना चीर कर रेत उत्खनन में लगे हुए है। कोरबा जिले की जीवन दायनी नदियों में एक हसदेव नदी का सीना इन दिनों रेत माफिया छलनी करने में लगे है। हसदेव के साथ-साथ सहायक नदियों में रोजाना रेत का अवैध तरीके से खनन का खेल लगातार जारी है। रेत से भरी ऐसे सैकड़ों वाहन जो हर शाम से देर रात और अल सुबह तक सड़कों पर देखे जा रहे हैं। वहीं यह भी मानना कि शासन के नियमों की जमकर धज्जियां उड़ाई जा रही है। जबकि शासन की गाइड लाइन के अनुसार आवंटित रेत खदानों में आवंटित सीमा के अंतर्गत ही उत्खनन करना है। जबकि यहां पर सीमा नहीं बनाया गया है ना ही सूचना पटल बोर्ड लगाया गया है। जहां नदियों में अवैध रूप से चल रहे रेत उत्खनन कार्य से जहां शासन को लाखों रुपए के रॉयल्टी का नुकसान हो रहा है। वहीं दूसरी ओर पर्यावरण को भी नुकसान पहुंच रहा है, इसके साथ ही नदियों के अस्तित्व पर संकट भी गहराता जा रहा है। कई जगह नदियों में रेत की खदान इतने ज्यादा बढ़ गए है कि वहां जनजीवन पर भी इसका असर दिखने लगा है। जानकारी के मुताबिक रेत के इस अवैध कारोबार में जिले के अलावा आस-पास के जिले के दबंगों, नेताओं और बाहरी राज्य के लोगों का खेल चल रहा है। जहां दिन और रात रेत का अवैध कारोबार चला रहा है, स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि अगर रेत खनन का विरोध भी किया जाता है तो उन्हें दबंग और नेताओं द्वारा न केवल धौंस देकर डराया जाता है। बल्कि डराया और नेतागिरी का पावर दिखाया जाता है । ग्रामीणों का कहना है कि अगर शासन प्रशासन से मदद मांग भी ले, तो उन्हें किसी का सहारा नहीं मिलता। इससे ग्रामीण भी काफी डरे हुए महसूस कर रहे है। दरअसल बारिश से ठीक पहले निर्माण कार्यों में तेजी आने की वजह से रेत की मांग बढ़ गई है। जिससे रेत माफिया अवैध रूप से नदी-नालों से रेत उत्खनन कर शासन को लाखों-करोड़ों का चूना लगा रहे है।अवैध रूप से उत्खनन कार्य को रोकने के लिए शासन द्वारा खनिज विभाग में अफसरों की भी तैनाती की गई है। लेकिन विडंबना है, कि खनिज विभाग द्वारा ना तो रेत माफियाओं को रोक पा रहा है,और ना ही रेत का उत्खनन रोकने की दिशा में ठोस कदम उठा पा रहे है, जबकि नदियों की किनारे बड़े बड़े खाई बनते जा रही है।जहां कभी बड़ी हादसा हो सकती है। यहां तक मशीनों से अनवरत खुदाई की वजह से नदी किनारे खाई में तब्दील हो रहे हैं। जिन्हें भरने में समय लगेगा। जहां जांच का विषय है कि ऐसी गहरी खदानों को देखकर यह साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह काम मजदूरों ने नहीं, बल्कि मशीनों से किया जा रहा है। गौरतलब सक्रिय रेत माफियाओं को जनप्रतिनिधियों का संरक्षण प्राप्त है कहने से इंकार नहीं किया जा सकता है।जहां लोगों का कहना है कि कार्यवाही होने पर राजनीतिक दबाव अधिकारियों पर बनाया जाता है। जिससे कार्यवाही करने में सरकारी अमले आगे कार्रवायी नहीं करता। जानकारी के अनुसार कई जगह जनप्रतिनिधियों के परिजन ही रेत उत्खनन और परिवहन का काम कर रहे हैं। यहाँ तक लीज पर चल रहे रेत खदान की सीमा क्षेत्र से बाहर जाकर निकाली जा रही रेत,जो नियमों का किया जा रहा है घोर उल्लंघन । वहीं नदियों में मशीन से खुदाई के दिए गए निर्देश में नियमों की अनदेखी की जा रही है। ठेकेदार अपने तरीके से नदियों में बांध बनाकर मशीनों को उतार रहे हैं। नदियों में खुदाई के दौरान कितनी चौड़ाई में रास्ता बनाकर पानी रोकना और फिर कितनी गहराई में खुदाई करना है। इसका पालन नहीं किया जा रहा है। इससे नदी की धारा भी प्रभावित हो रही है। खनन के दौरान खुलेआम मनमानी और नेशनल ग्रीन टिब्यूनल (एनजीटी) की गाइडलाइन को ताक पर रख दिया गया है। समीपी ग्रामीणों ने बताया कि बीच नदी रेत का पहाड़ खड़ा कर दिया गया है।आसपास चारो ओर पानी के बीच से जेसीबी लगाकर रेत निकाली जा रही है। जानकार बताते हैं कि एनजीटी की गाइडलाइन के अनुसार पानी के अंदर से रेत खनन प्रतिबंधित है, ताकि नदियों का इकोसिस्टम प्रभावित नहीं हो। इसके अलावा खनन के दौरान कुछ घाट में तीन व कुछ में 6 मीटर गहराई से ज्यादा रेत नहीं निकालने के भी निर्देश हैं। ग्रामीणों ने बताया कि नदियों में रेत खनन के दौरान मनमानी का आलम यह है कि कई मीटर गहराई में खनन किया गया है। अलबत्ता शासन के नियमो की माने, तो नदी के रेत को अंदर से मशीन द्वारा नहीं निकाल सकते हैं। वहीं एनजीटी के नियमानुसार नदी के अंदर मशीन की मदद से रेत नहीं निकाल सकते। क्योकि मशीनों के उत्खनन से पर्यावरण को खतरा है। जबकि दुल्लापुर रेत ठेकदार का बोलना है की उनको पोकलैंड लगाने के लिए विशेष अनुमति दिया गया है। वही ग्रामीणों द्वारा कोरबा खनिज विभाग के अधिकारियों से फोन से संपर्क करने की कोशिश की जाती है। पर जानबुझ कर अधिकारी बात नहीं करते।गोंडवाना गणतंत्र पार्टी द्वारा उपरोक्त रेत की उत्खनन को लेकर काफी गंभीरता के प्रशासन तक उचित कार्यवाही के लिए अपनी रणनीति तेज कर दी हैं। और आदिवासी बाहुल्य इलाका में पांचवी अनुसूची के तहत जो अधिकार प्रदत है लागू करने की बात कही है।